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सोमवार, 28 जुलाई 2014

बुद्धिवर्धक कहानियाँ - ( आत्मा को खोजो भाई ! ) - { Inspiring Stories - part - 9 }

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बुद्धिवर्धक कहानियाँ - भाग - ९ पे आप सबका स्वागत है , भाग - ८ की कहानी तो आपने पढ़ी ही होगी , अगर नहीं तो यहाँ पे क्लिक करें ! तो आइये अब प्रस्थान करते हैं , आज की सुंदर एवम् प्रेरक कहानी की ओर - जिसका नाम है - ( "आत्मा को खोजो भाई !" )
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बारह यात्री थे। वे एक नगर से दूसरे नगर को जा रहे थे। आगे बढ़े तो एक नदी आ गई। कोई पुल नहीं , कोई नाव नहीं। पार तो पहुँचना ही है , परंतु कैसे ?
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उनमें से एक सयाना था। वह बोला - " घबराओ नहीं ! एक-दूसरे का हाथ थाम लो। मिलकर हम पार हो जाएँगे। "
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सबने एक-दूसरे के हाथ कसकर पकड़ लिये। सावधानी से नदी पार करके दूसरे किनारे जा पहुँचे। स्याना व्यक्ति बोला - " अब गिनती करके देख लो , कोई नदी में तो नहीं रह गया ? "
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दूसरा बोला - " सबसे बुद्धिमान तू है , अब तू ही गिन। "
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स्याना गिनने लगा - " एक , दो , तीन , चार , पाँच , छः , सात , आठ , नौ , दस , ग्यारह। " स्वयं को उसने गिना ही नहीं। चौंककर बोला - " हम तो ग्यारह हैं ! एक साथी कहाँ गया ? "
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दूसरे ने गिना तो अपने-आप को भूल गया। इस तरह तीसरे , चौथे और बारी-बारी से सभी ने ग्यारह ही गिने। रोने लगे कि एक साथी डूब गया।
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तभी एक यात्री आ गया। उसने उनके रोने का कारण पूछा।
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स्याने ने सारी बात कह बताई।
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यात्री ने उन्हें देखते हुए मन में गिना तो वे बारह थे। उसने कहा - " यदि मैं तुम्हारे बारहवे साथी को खोज दूँ , तो ? "
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वे बोले - " तब तो हम तुम्हें भगवान् मान लेंगे। "
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यात्री बोला - " तुम सब बैठ जाओ। मैं एक-एक को चपत मारूँगा। जिसे चपत लगे , वह क्रम से एक , दो , तीन गिनता जाए। "
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इस तरह यात्री चपत मारता गया और वे लोग एक से बारह तक गिनते गए। अंत में बोले - "तुम सचमुच भगवान् हो !"
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आपको इन यात्रियों पर हँसी आती है , परंतु हम स्वयं भी इसी मूर्खता के शिकार हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ , पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और ग्यारहवें मन को तो हम पहचानते हैं , परंतु बारहवें आत्मा को हम भुला बैठे हैं। हम दुनिया-भर के बखेड़े करते हैं , किन्तु आत्मा के लिए कुछ नहीं करते। ग्यारह की तृप्ति में ही डूब गया है , तभी तो मनुष्य दुःखी और अशान्त है।
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~ कहानी लेखक - महात्मा आनन्द स्वामी ~
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मित्रों व प्रिय पाठकों - कृपया अपने विचार टिप्पणी के रूप में ज़रूर अवगत कराएं - जिससे हमें लेखन व प्रकाशन का हौसला मिलता रहे ! धन्यवाद !
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22 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. राजीव भाई धन्यवाद व स्वागत हैं !

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. आ. धन्यवाद व सदा ही स्वागत हैं !

      हटाएं
  3. सार्थक लेखन
    प्रेरक कहानी

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  4. एक कहानी बहुत ही नीतिपरक एवं विद्वतापूर्ण ! अति सुंदर !

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. बहुत खूब आशीष भाई ... इस कहानी के माध्यम से आत्मा जो सा बातों का मूल है उसका महत्त्व समझा दिया ...
    बहुत ही सार्थक और ज्ञानवर्धक कहानी ....

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  7. वाह क्या बात है. बहुत खूब. सार्थक और प्रेरक कहानी

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्मिता जी धन्यवाद व सदा ही स्वागत हैं !

      हटाएं
  8. सार्थक एवम् प्रेरक कहानी....

    उत्तर देंहटाएं
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